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Narasimha Jayanti 2026 – नृसिंह भगवान की जयंती: तारीख, कथा, पूजा विधि और महत्व
भक्त प्रह्लाद ने कहा था — ‘भगवान हर जगह हैं। इस खंभे में भी।’ और जब उनके पिता हिरण्यकशिपु ने क्रोध में खंभा तोड़ा, तो उसमें से प्रकट हुए भगवान नृसिंह — आधे मनुष्य, आधे सिंह के रूप में — और उन्होंने भक्त की रक्षा की और अत्याचारी का अंत किया।
यह दिव्य घटना वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को हुई थी, और इसी कारण हर साल इस दिन को Narasimha Jayanti के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का और सच्ची भक्ति की अजेय शक्ति का उत्सव है।
Narasimha Jayanti 2026 – तारीख और मुहूर्त
| तारीख | 30 अप्रैल 2026, बृहस्पतिवार |
| तिथि | वैशाख शुक्ल चतुर्दशी |
| चतुर्दशी प्रारंभ | 29 अप्रैल 2026, शाम 7:51 बजे |
| चतुर्दशी समाप्ति | 30 अप्रैल 2026, रात 9:12 बजे |
| मध्याह्न संकल्प मुहूर्त | 11:19 AM – 1:53 PM (30 अप्रैल) |
| सायंकाल पूजा मुहूर्त | 4:27 PM – 7:00 PM (30 अप्रैल) — सर्वोत्तम समय |
| पारण | 1 मई 2026, सूर्योदय के बाद 6:11 AM से |
| देवता | भगवान नृसिंह (विष्णु जी का चतुर्थ अवतार) |
| भोग | पंचामृत, तुलसी, चंदन, केसर, पीले पुष्प, फल, नारियल |
नोट: पूजा मुहूर्त नई दिल्ली, IST के अनुसार है। अपने स्थान के लिए स्थानीय पंचांग देखें।
Narasimha Jayanti का महत्व
धार्मिक महत्व
- नृसिंह जी भगवान विष्णु के चतुर्थ अवतार हैं — दस अवतारों (दशावतार) में से।
- इस दिन व्रत-पूजन करने से शत्रु भय, रोग, ऋण और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति मिलती है।
- नृसिंह जी की उपासना विशेष रूप से उन भक्तों के लिए है जो निर्बल, भयभीत या संकट में हैं।
- शास्त्रों के अनुसार इस दिन व्रत रखने से सभी पापों का नाश होता है और विष्णु लोक की प्राप्ति होती है।
आध्यात्मिक संदेश
नृसिंह अवतार की कथा हमें सिखाती है कि ईश्वर हर जगह हैं — और जब भक्त संकट में हो, तो वे किसी भी रूप में, कहीं से भी प्रकट होकर उसकी रक्षा करते हैं। यह कथा हमारे अंदर के भय को दूर करती है और आस्था को मजबूत करती है।
प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु की कथा – Narasimha Jayanti Katha
हिरण्यकशिपु को मिला वरदान
कश्यप ऋषि और दिति के पुत्र हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष दोनों असुर थे। भगवान विष्णु ने वराह अवतार में हिरण्याक्ष का वध किया। इससे क्रोधित होकर हिरण्यकशिपु ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की और एक अजेय वरदान पाया — वह न मनुष्य से मरे, न पशु से, न दिन में न रात में, न भीतर न बाहर, न ऊपर न नीचे, न किसी अस्त्र-शस्त्र से।
भक्त प्रह्लाद की अटल भक्ति
हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु का परम भक्त था। पिता ने उसे हर प्रकार से डराया, यातनाएं दीं — आग में फेंका, हाथी से कुचलवाने की कोशिश की, जहर दिया — परंतु भगवान हर बार प्रह्लाद की रक्षा करते रहे। प्रह्लाद की भक्ति न टूटी।
नृसिंह भगवान का प्राकट्य
एक दिन क्रोध में हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद से पूछा — ‘कहाँ है तेरा भगवान?’ प्रह्लाद ने कहा — ‘वे सर्वत्र हैं, इस खंभे में भी।’ हिरण्यकशिपु ने खंभे पर मुक्का मारा — और उसमें से प्रकट हो गए भगवान नृसिंह — आधे मनुष्य, आधे सिंह के रूप में, संध्याकाल में (न दिन न रात), दरवाजे की दहलीज पर (न अंदर न बाहर), हिरण्यकशिपु को गोद में रखकर (न धरती पर न आकाश में), और अपने नाखूनों से (न अस्त्र न शस्त्र) वध किया। इस प्रकार वरदान की सभी शर्तें पूरी करते हुए भगवान ने अपने भक्त की रक्षा की।
विष्णु जी के अन्य अवतारों की जानकारी: विष्णु चालीसा हिंदी में
Narasimha Jayanti Puja Vidhi – पूजा विधि
एक दिन पहले (दशमी/त्रयोदशी)
- सात्त्विक भोजन करें, प्याज-लहसुन वर्जित।
- पूजा सामग्री एकत्रित करें।
नृसिंह जयंती के दिन — विधिपूर्वक पूजा
- ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करें।
- नृसिंह जी या भगवान विष्णु की प्रतिमा/चित्र स्थापित करें।
- पंचामृत अभिषेक करें — दूध, दही, घी, शहद, शक्कर से।
- चंदन, केसर, तुलसी दल, पीले पुष्प और फल अर्पित करें।
- मध्याह्न काल में संकल्प लें और भगवान नृसिंह का ध्यान करें।
- सायंकाल मुहूर्त में मुख्य पूजा करें — यही समय सर्वोत्तम है।
- ‘ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्’ मंत्र का जाप करें।
- रात्रि जागरण करें, भजन-कीर्तन में बिताएं।
- अगले दिन 1 मई, सूर्योदय के बाद पारण करें।
प्रमुख नृसिंह मंत्र
ॐ नमो भगवते नृसिंहाय नमः
ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् | नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् ||
व्रत नियम और आहार
| क्या करें | क्या न करें |
| सूर्योदय से व्रत प्रारंभ | चावल, गेहूं, अनाज |
| फलाहार — फल, दूध, मखाना | प्याज, लहसुन, माँस |
| सात्त्विक आहार — कुट्टू, साबूदाना | साधारण नमक (सेंधा नमक चलता है) |
| तुलसी दल — पूजा में अनिवार्य | तुलसी एकादशी के दिन पहले तोड़ लें |
| रात्रि जागरण — भजन-कीर्तन | नकारात्मक विचार, क्रोध, झूठ |
Narasimha Jayanti 2026 – FAQs
Narasimha Jayanti 2026 कब है?
Narasimha Jayanti 2026 में 30 अप्रैल, बृहस्पतिवार को मनाई जाएगी। यह वैशाख शुक्ल चतुर्दशी तिथि है। पूजा का सर्वोत्तम समय सायंकाल 4:27 PM से 7:00 PM के बीच है।
नृसिंह भगवान कौन हैं?
नृसिंह भगवान विष्णु के दशावतार में चतुर्थ (चौथे) अवतार हैं। वे आधे मनुष्य और आधे सिंह के रूप में प्रकट हुए थे — अपने परम भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए और अत्याचारी हिरण्यकशिपु का वध करने के लिए।
नृसिंह जयंती पर किसकी पूजा करें?
भगवान नृसिंह की पूजा करें। उनकी प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। पंचामृत से अभिषेक करें, तुलसी, चंदन, पीले पुष्प अर्पित करें। नृसिंह मंत्र का जाप करें और रात्रि जागरण करें।
क्या नृसिंह जयंती पर उपवास जरूरी है?
व्रत करना फलदायी है लेकिन अनिवार्य नहीं। जो व्रत नहीं रख सकते, वे पूजा, मंत्र जाप और रात्रि जागरण करके भगवान की कृपा पा सकते हैं। बीमार या कमजोर लोग फलाहार कर सकते हैं।
नृसिंह जयंती का व्रत कब तोड़ें?
अगले दिन 1 मई 2026 को सूर्योदय के बाद 6:11 AM से पारण करें। पारण से पहले भगवान को भोग लगाएं और किसी जरूरतमंद को भोजन कराएं।
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आरती: भगवान विष्णु की आरती
चालीसा: विष्णु चालीसा हिंदी में
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एकादशी: Ekadashi 2026 List
पूर्णिमा: Purnima 2026 Dates
निष्कर्ष
Narasimha Jayanti हमें याद दिलाती है कि जब भक्ति सच्ची हो, तो भगवान खुद आकर हमारी रक्षा करते हैं। प्रह्लाद ने अपने भक्ति का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया जो युगों-युगों तक प्रेरणा देता है।
ॐ नमो भगवते नृसिंहाय नमः — भगवान नृसिंह की जय! भक्त की रक्षा, अत्याचार का नाश।
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गुरु पूर्णिमा 2026: महत्व, पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और मंत्र

गुरु पूर्णिमा हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण पर्व है। यह दिन गुरु के सम्मान, श्रद्धा और आशीर्वाद को समर्पित माना जाता है। सनातन परंपरा में गुरु को भगवान से भी श्रेष्ठ स्थान दिया गया है क्योंकि गुरु ही जीवन में सही मार्ग दिखाते हैं। गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है, क्योंकि इसी दिन महर्षि वेदव्यास जी का जन्म हुआ था।
इस पावन अवसर पर लोग अपने गुरु की पूजा करते हैं, आशीर्वाद लेते हैं और आध्यात्मिक साधना करते हैं। आइए जानते हैं गुरु पूर्णिमा का महत्व, पूजा विधि, मंत्र और इस दिन किए जाने वाले शुभ कार्य।
गुरु पूर्णिमा का महत्व
हिंदू धर्म में गुरु को ज्ञान का स्रोत माना गया है। गुरु पूर्णिमा का पर्व शिष्य और गुरु के पवित्र संबंध को दर्शाता है। मान्यता है कि इस दिन गुरु की पूजा और सेवा करने से जीवन में सफलता, ज्ञान और मानसिक शांति प्राप्त होती है।
यह पर्व विद्यार्थियों, साधकों और आध्यात्मिक लोगों के लिए विशेष महत्व रखता है। इस दिन महर्षि वेदव्यास जी की पूजा भी की जाती है, जिन्होंने वेदों और पुराणों का ज्ञान दुनिया को दिया।
गुरु पूर्णिमा 2026 शुभ मुहूर्त
- पूर्णिमा तिथि प्रारंभ – (अपडेट अनुसार जोड़ें)
- पूर्णिमा तिथि समाप्त – (अपडेट अनुसार जोड़ें)
- पूजा का शुभ समय – सुबह ब्रह्म मुहूर्त और शाम का समय शुभ माना जाता है।
गुरु पूर्णिमा पूजा सामग्री
पूजा के लिए निम्न सामग्री तैयार रखें:
- गुरु या महर्षि वेदव्यास जी की तस्वीर
- फूल और माला
- धूप और दीपक
- चंदन
- अक्षत
- मिठाई और फल
- गंगाजल
- पीले वस्त्र
- प्रसाद
गुरु पूर्णिमा पूजा विधि
1. सुबह स्नान करें
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र पहनें।
2. पूजा स्थल तैयार करें
घर के मंदिर या साफ स्थान पर गुरु या वेदव्यास जी की तस्वीर स्थापित करें।
3. दीपक और धूप जलाएं
घी का दीपक जलाकर पूजा की शुरुआत करें।
4. गुरु पूजन करें
गुरु की तस्वीर पर चंदन, अक्षत और फूल अर्पित करें।
5. मंत्र जाप करें
गुरु मंत्र:
“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥”
6. आरती और प्रसाद
पूजा के बाद आरती करें और प्रसाद वितरित करें।
गुरु पूर्णिमा पर क्या करें?
- गुरु का आशीर्वाद लें
- धार्मिक ग्रंथों का पाठ करें
- दान और सेवा करें
- ध्यान और साधना करें
गुरु पूर्णिमा पर क्या नहीं करना चाहिए?
- गुरु का अपमान न करें
- क्रोध और विवाद से बचें
- गलत शब्दों का प्रयोग न करें
- नकारात्मक सोच से दूर रहें
गुरु पूर्णिमा पूजा के लाभ
- ज्ञान और बुद्धि में वृद्धि होती है
- जीवन में सफलता प्राप्त होती है
- मानसिक शांति मिलती है
- गुरु कृपा प्राप्त होती है
- आध्यात्मिक उन्नति होती है
गुरु पूर्णिमा FAQ
गुरु पूर्णिमा क्यों मनाई जाती है?
गुरु पूर्णिमा गुरु के सम्मान और महर्षि वेदव्यास जी की जयंती के रूप में मनाई जाती है।
गुरु पूर्णिमा पर किसकी पूजा की जाती है?
इस दिन गुरु, महर्षि वेदव्यास और भगवान विष्णु की पूजा की जाती है।
गुरु पूर्णिमा पर कौन सा मंत्र बोलना चाहिए?
“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः…” मंत्र का जाप अत्यंत शुभ माना जाता है।
गुरु पूर्णिमा का क्या महत्व है?
यह दिन ज्ञान, आध्यात्मिकता और गुरु कृपा प्राप्त करने के लिए विशेष माना जाता है।
क्या गुरु पूर्णिमा पर व्रत रखा जाता है?
हाँ, कई लोग इस दिन व्रत रखकर पूजा और साधना करते हैं।
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एकादशी 2026: Ekadashi 2026 List – सभी 26 एकादशी तारीख
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त्योहार: Hindu Festival Calendar 2026
निष्कर्ष
गुरु पूर्णिमा गुरु के प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करने का सबसे पवित्र अवसर माना जाता है। इस दिन विधिपूर्वक पूजा, मंत्र जाप और गुरु सेवा करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, ज्ञान और सफलता प्राप्त होती है।
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Ekadashi 2026 List – सभी 26 एकादशी व्रत की तारीख, नाम और महत्व

हिंदू पंचांग में एकादशी उस तिथि को कहते हैं जो हर चंद्र माह में दो बार आती है — एक शुक्ल पक्ष में और एक कृष्ण पक्ष में। यानी साल में 24 एकादशियाँ होती हैं। लेकिन वर्ष 2026 में अधिक मास (अधिक ज्येष्ठ) के कारण दो अतिरिक्त एकादशियाँ और जुड़ जाती हैं — जिससे इस साल कुल 26 एकादशियाँ हैं।
एकादशी व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है। शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक एकादशी का व्रत करता है, उसे एक हजार अश्वमेध यज्ञों और सौ राजसूय यज्ञों के बराबर पुण्य मिलता है। एकादशी केवल उपवास नहीं है — यह मन, शरीर और आत्मा की शुद्धि का दिन है।
इस पृष्ठ पर आपको मिलेगी 2026 की सभी 26 एकादशियों की सम्पूर्ण सूची — तारीख, नाम, पक्ष, और हर एकादशी का विशेष महत्व।
Ekadashi 2026 – एक नज़र में
| कुल एकादशी 2026 | 26 (24 सामान्य + 2 अधिक मास की विशेष एकादशी) |
| अधिक मास | 17 मई – 15 जून 2026 (अधिक ज्येष्ठ मास) |
| पहली एकादशी | 14 जनवरी 2026 — षट्तिला एकादशी |
| अंतिम एकादशी | 20 दिसंबर 2026 — मोक्षदा एकादशी (गीता जयंती) |
| सबसे कठिन व्रत | निर्जला एकादशी (25 जून) — बिना जल के उपवास |
| सबसे महत्वपूर्ण | देवशयनी, देवउठनी, निर्जला, मोक्षदा एकादशी |
| देवता | भगवान विष्णु (श्री हरि) |
| पारण | अगले दिन द्वादशी तिथि में, सूर्योदय के बाद |
Ekadashi 2026 List – सम्पूर्ण 26 एकादशी तारीख और नाम
नीचे दी गई सूची उत्तर भारतीय पंचांग (IST, नई दिल्ली) पर आधारित है। स्थान के अनुसार तारीख में 1 दिन का अंतर हो सकता है।
| क्र. | एकादशी नाम | तारीख व दिन | पक्ष / मास |
| 1 | षट्तिला एकादशी | 14 जनवरी 2026, बुधवार | पौष कृष्ण एकादशी |
| 2 | जया एकादशी | 29 जनवरी 2026, बृहस्पतिवार | माघ शुक्ल एकादशी |
| 3 | विजया एकादशी | 13 फरवरी 2026, शुक्रवार | माघ कृष्ण एकादशी |
| 4 | आमलकी एकादशी | 27 फरवरी 2026, शुक्रवार | फाल्गुन शुक्ल एकादशी |
| 5 | पापमोचनी एकादशी | 15 मार्च 2026, रविवार | चैत्र कृष्ण एकादशी |
| 6 | कामदा एकादशी | 29 मार्च 2026, रविवार | चैत्र शुक्ल एकादशी |
| 7 | वरूथिनी एकादशी | 13 अप्रैल 2026, सोमवार | वैशाख कृष्ण एकादशी |
| 8 | मोहिनी एकादशी | 27 अप्रैल 2026, सोमवार | वैशाख शुक्ल एकादशी |
| 9 | अपरा एकादशी | 13 मई 2026, बुधवार | ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी |
| 10 | पद्मिनी एकादशी (अधिक मास) | 27 मई 2026, बुधवार | अधिक ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी |
| 11 | परमा एकादशी (अधिक मास) | 11 जून 2026, बृहस्पतिवार | अधिक ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी |
| 12 | निर्जला एकादशी | 25 जून 2026, बृहस्पतिवार | ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी |
| 13 | योगिनी एकादशी | 10 जुलाई 2026, शुक्रवार | आषाढ़ कृष्ण एकादशी |
| 14 | देवशयनी एकादशी | 25 जुलाई 2026, शनिवार | आषाढ़ शुक्ल एकादशी |
| 15 | कामिका एकादशी | 9 अगस्त 2026, रविवार | श्रावण कृष्ण एकादशी |
| 16 | श्रावण पुत्रदा एकादशी | 23 अगस्त 2026, रविवार | श्रावण शुक्ल एकादशी |
| 17 | अजा एकादशी | 7 सितंबर 2026, सोमवार | भाद्रपद कृष्ण एकादशी |
| 18 | परिवर्तिनी / पद्मा एकादशी | 22 सितंबर 2026, मंगलवार | भाद्रपद शुक्ल एकादशी |
| 19 | इंदिरा एकादशी | 6 अक्टूबर 2026, मंगलवार | आश्विन कृष्ण एकादशी |
| 20 | पापांकुशा एकादशी | 22 अक्टूबर 2026, बृहस्पतिवार | आश्विन शुक्ल एकादशी |
| 21 | रमा एकादशी | 5 नवंबर 2026, बृहस्पतिवार | कार्तिक कृष्ण एकादशी |
| 22 | देवउठनी / प्रबोधिनी एकादशी | 20 नवंबर 2026, शुक्रवार | कार्तिक शुक्ल एकादशी |
| 23 | उत्पन्ना एकादशी | 4 दिसंबर 2026, शुक्रवार | मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी |
| 24 | मोक्षदा एकादशी | 20 दिसंबर 2026, रविवार | मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी |
* पारण (व्रत खोलना): प्रत्येक एकादशी के अगले दिन द्वादशी तिथि में सूर्योदय के बाद करें।
हर एकादशी का महत्व – संक्षिप्त विवरण
हर एकादशी का अपना अलग महत्व और कथा है। यहाँ सभी 26 एकादशियों का संक्षिप्त महत्व दिया गया है:
| एकादशी | महत्व / विशेषता |
| षट्तिला एकादशी | दान-पुण्य का विशेष दिन, तिल दान से पापों का नाश |
| जया एकादशी | भूत-प्रेत बाधाओं से मुक्ति, स्वर्गलोक प्राप्ति |
| विजया एकादशी | शत्रुओं पर विजय, युद्ध या संघर्ष में सफलता |
| आमलकी एकादशी | आंवले की पूजा — आयु, स्वास्थ्य और मोक्ष की प्राप्ति |
| पापमोचनी एकादशी | पापों से मुक्ति, नकारात्मक ऊर्जा का नाश |
| कामदा एकादशी | मनोकामना पूर्ण, शाप-मोचन |
| वरूथिनी एकादशी | दस अश्वमेध यज्ञ का फल, सौभाग्य वृद्धि |
| मोहिनी एकादशी | मोह-माया से मुक्ति, राम जी की पूजा |
| अपरा एकादशी | अपार पुण्य, ब्रह्महत्या जैसे पापों का नाश |
| पद्मिनी एकादशी (अधिक मास) | अधिक मास की विशेष एकादशी — हजार गुना फल |
| परमा एकादशी (अधिक मास) | अधिक मास की दूसरी विशेष एकादशी — विष्णु जी को अत्यंत प्रिय |
| निर्जला एकादशी | सभी 24 एकादशियों का फल — बिना जल के उपवास |
| योगिनी एकादशी | रोग-शोक से मुक्ति, ८८ हजार ब्राह्मण भोज का पुण्य |
| देवशयनी एकादशी | चातुर्मास प्रारंभ — भगवान विष्णु योगनिद्रा में जाते हैं |
| कामिका एकादशी | तुलसी पूजा से विशेष फल, श्रावण का पवित्र व्रत |
| श्रावण पुत्रदा एकादशी | संतान प्राप्ति, पुत्र की लंबी उम्र के लिए |
| अजा एकादशी | अजन्मे दोषों का नाश, वाजपेय यज्ञ का फल |
| परिवर्तिनी / पद्मा एकादशी | विष्णु जी करवट बदलते हैं — करोड़ों गोदान का फल |
| इंदिरा एकादशी | पितृ दोष से मुक्ति, पितरों की आत्मा की शांति |
| पापांकुशा एकादशी | पापों का नाश, नरक से मुक्ति |
| रमा एकादशी | धन-धान्य, सौभाग्य और वैभव |
| देवउठनी / प्रबोधिनी एकादशी | विष्णु जी जागते हैं — चातुर्मास समाप्त, विवाह मुहूर्त शुरू |
| उत्पन्ना एकादशी | एकादशी व्रत की उत्पत्ति का दिन — महाफलदायी |
| मोक्षदा एकादशी | गीता जयंती — मोक्ष प्राप्ति, वैकुंठ एकादशी |
2026 की 4 सबसे महत्वपूर्ण एकादशियाँ
निर्जला एकादशी – 25 जून 2026 (सर्वश्रेष्ठ एकादशी)
निर्जला एकादशी को ‘भीमसेनी एकादशी’ भी कहते हैं। इस दिन बिना अन्न और बिना जल के उपवास किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार यह एकादशी अकेले साल की सभी 24 एकादशियों के समान पुण्य देती है। जेठ के महीने में यह व्रत करना अत्यंत कठिन है, लेकिन उतना ही फलदायी भी।
देवशयनी एकादशी – 25 जुलाई 2026 (चातुर्मास प्रारंभ)
इस दिन भगवान विष्णु 4 महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इस दिन से चातुर्मास शुरू होता है — जिसमें विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कार्य बंद हो जाते हैं। चातुर्मास में पूजा-पाठ, भजन और साधना का विशेष महत्व है।
देवउठनी एकादशी – 20 नवंबर 2026 (चातुर्मास समाप्ति)
देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु चार महीने की नींद से जागते हैं। इस दिन से विवाह और अन्य मांगलिक कार्यों के मुहूर्त फिर शुरू होते हैं। इस दिन तुलसी विवाह का भी आयोजन किया जाता है।
मोक्षदा एकादशी – 20 दिसंबर 2026 (गीता जयंती)
मोक्षदा एकादशी के दिन ही भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था — इसलिए इसे गीता जयंती भी कहते हैं। इस दिन पूर्वजों को मोक्ष मिलता है और भक्त को वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है।
अधिक मास 2026 की दो विशेष एकादशियाँ
2026 में अधिक ज्येष्ठ मास (17 मई – 15 जून) के दौरान दो अतिरिक्त एकादशियाँ आती हैं। शास्त्रों में इन्हें साधारण एकादशियों से हजार गुना अधिक फलदायी बताया गया है।
| पद्मिनी एकादशी | 27 मई 2026 (बुधवार) — अधिक मास शुक्ल एकादशी — सम्पत्ति दोष और दरिद्रता से मुक्ति |
| परमा एकादशी | 11 जून 2026 (बृहस्पतिवार) — अधिक मास कृष्ण एकादशी — विष्णु जी को अत्यंत प्रिय, जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति |
इन दोनों दिनों भगवान विष्णु की विशेष पूजा, भजन, सत्यनारायण कथा और दान करने से अत्यंत शुभ फल मिलता है।
Ekadashi Vrat Vidhi – व्रत की सही विधि
दशमी (एक दिन पहले)
- एकादशी से एक दिन पहले सात्त्विक भोजन करें।
- रात को हल्का भोजन करें — प्याज, लहसुन, माँस वर्जित।
- रात्रि में भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए सोएं।
एकादशी के दिन
- प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।
- भगवान विष्णु या श्री कृष्ण की मूर्ति/फोटो के सामने दीप, फूल, तुलसी दल, पान, अक्षत और फल अर्पित करें।
- ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करें।
- विष्णु सहस्रनाम, भागवत कथा या एकादशी माहात्म्य का पाठ करें।
- दिन-रात जागरण करें — भजन-कीर्तन में समय बिताएं।
- व्रत में केवल फलाहार, दूध, दही, मखाना, साबूदाना, कुट्टू का आटा ग्रहण करें।
- चावल, गेहूं, दाल और नमक (सेंधा नमक स्वीकृत है) वर्जित है।
द्वादशी पर पारण
- अगले दिन (द्वादशी) सूर्योदय के बाद पारण करें।
- पारण से पहले किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन कराएं।
- पारण का समय: पंचांग में दिए द्वादशी के अनुसार — इसे अनदेखा न करें।
एकादशी व्रत की विस्तृत कथा पढ़ें: एकादशी व्रत कथा संग्रह
Ekadashi Vrat में क्या खाएं / क्या न खाएं
| क्या खाएं (अनुमति है) | क्या न खाएं (वर्जित है) |
| फल — केला, सेब, अनार, आम, अंगूर | चावल, गेहूं, जौ, मक्का |
| दूध, दही, पनीर, मट्ठा | सभी प्रकार की दाल |
| मखाना, सिंघाड़े का आटा, कुट्टू का आटा | प्याज, लहसुन, हरी सब्जियां (कुछ परंपराओं में) |
| साबूदाना खिचड़ी या खीर | माँस, मछली, अंडा |
| मूंगफली, काजू, बादाम, किशमिश | साधारण नमक (सेंधा नमक चलता है) |
| शहद, चाय (बिना दूध) | शराब, तम्बाकू |
| आलू, शकरकंद (सात्त्विक रूप से) | बाजारू जंक फूड, तले-भुने व्यंजन |
Ekadashi 2026 – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
2026 में कितनी एकादशियाँ हैं?
2026 में कुल 26 एकादशियाँ हैं। सामान्य वर्ष में 24 एकादशियाँ होती हैं, लेकिन 2026 में अधिक मास (17 मई – 15 जून) पड़ने के कारण 2 अतिरिक्त एकादशियाँ — पद्मिनी (27 मई) और परमा (11 जून) — भी आती हैं।
एकादशी का व्रत किसके लिए है?
एकादशी व्रत भगवान विष्णु के भक्तों के लिए है। स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध — सभी इस व्रत को कर सकते हैं। जो पूर्ण उपवास नहीं कर सकते, वे फलाहार कर सकते हैं। मुख्य बात श्रद्धा और भक्ति है।
एकादशी के दिन चावल क्यों नहीं खाते?
शास्त्रों के अनुसार, एकादशी के दिन चावल में महर्षि जी का वास होता है — इसलिए इसे खाना वर्जित माना जाता है। इस दिन अन्न (अनाज) का सेवन पुण्य को नष्ट करता है। इसीलिए व्रत में फल, दूध और कुट्टू का आटा खाया जाता है।
2026 में सबसे महत्वपूर्ण एकादशी कौन सी है?
2026 की चार सबसे महत्वपूर्ण एकादशियाँ हैं: (1) निर्जला एकादशी (25 जून) — सभी एकादशियों का फल देने वाली, (2) देवशयनी एकादशी (25 जुलाई) — चातुर्मास शुरू, (3) देवउठनी एकादशी (20 नवंबर) — चातुर्मास समाप्त, और (4) मोक्षदा एकादशी (20 दिसंबर) — गीता जयंती।
एकादशी पारण का क्या अर्थ है?
पारण का अर्थ है एकादशी व्रत का समापन — यानी उपवास तोड़ना। यह अगले दिन द्वादशी तिथि में, सूर्योदय के बाद करना चाहिए। पारण का समय पंचांग में दिया होता है — समय से बाहर पारण करना पुण्य को नष्ट करता है।
क्या एकादशी का व्रत बीमारी में भी करना चाहिए?
बीमारी या कमजोरी की स्थिति में पूर्ण उपवास जरूरी नहीं है। ऐसे में फलाहार, दूध या हल्का सात्त्विक भोजन करते हुए मन से विष्णु जी का स्मरण करना भी व्रत के समान फल देता है। भगवान भाव के भूखे हैं, कठोरता के नहीं।
क्या अधिक मास की एकादशियाँ ज्यादा फलदायी हैं?
हाँ। शास्त्रों के अनुसार अधिक मास की एकादशियाँ — पद्मिनी (27 मई) और परमा (11 जून) — सामान्य एकादशियों से हजार गुना अधिक फलदायी हैं। यह अधिक मास भगवान विष्णु का महीना है, इसलिए इस माह में किए गए व्रत और पूजा का विशेष पुण्य मिलता है।
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निष्कर्ष – एकादशी व्रत: जीवन का सबसे सरल और शक्तिशाली व्रत
एकादशी व्रत के लिए न कोई बड़ा आयोजन चाहिए, न ज्यादा पैसा — बस चाहिए श्रद्धा, संकल्प और भगवान विष्णु पर विश्वास। साल में 26 एकादशियाँ मतलब 26 बार आपके जीवन को बेहतर बनाने का अवसर।
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय — प्रत्येक एकादशी पर जाप करें, श्री हरि की कृपा पाएं।
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Amavasya May 2026 – शनि अमावस्या: तारीख, पूजा विधि, महत्व और शनि दोष निवारण

‘शनि अमावस्या’ — यह नाम सुनते ही बहुत लोगों के मन में एक विशेष भावना जागती है। जब कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि शनिवार को पड़ती है, तो उसे शनि अमावस्या कहते हैं। यह दिन शनि देव की कृपा पाने, शनि दोष निवारण और पितृ तर्पण के लिए वर्ष की सबसे शक्तिशाली तिथियों में से एक माना जाता है।
2026 में शनि अमावस्या 16 मई, शनिवार को है — और यह अधिक मास से ठीक एक दिन पहले है। इसलिए इस बार का यह दिन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
Amavasya May 2026 – तारीख और विवरण
| तारीख | 16 मई 2026, शनिवार |
| तिथि | ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या (शनि अमावस्या) |
| अमावस्या प्रारंभ | 16 मई 2026, सुबह 5:11 बजे |
| अमावस्या समाप्ति | 17 मई 2026, रात 1:30 बजे |
| कुतुप मुहूर्त | दोपहर 11:36 – 12:24 बजे — पितृ तर्पण के लिए सर्वोत्तम |
| विशेष संयोग | अधिक मास प्रारंभ 17 मई से — यह आखिरी नियमित अमावस्या |
| शनि देव | शनि अमावस्या — शनि दोष, साढ़ेसाती, ढैय्या निवारण |
| पितृ कार्य | ज्येष्ठ अमावस्या — पितृ तर्पण और श्राद्ध के लिए उत्तम |
Shani Amavasya का महत्व – क्यों है यह इतनी खास?
शनि देव का संबंध
शनि देव न्याय के देवता हैं — वे कर्म के अनुसार फल देते हैं। जो लोग शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या या शनि महादशा से प्रभावित हैं, उनके लिए शनि अमावस्या एक महत्वपूर्ण अवसर है। इस दिन की गई पूजा और दान शनि देव को प्रसन्न करते हैं और उनके प्रकोप को शांत करते हैं।
पितरों का संबंध
प्रत्येक अमावस्या पितरों को समर्पित होती है। शनि अमावस्या पर शनि देव और पितर — दोनों की एक साथ पूजा होती है। पितृ दोष से मुक्ति और पितरों की शांति के लिए यह दिन विशेष फलदायी माना जाता है।
विशेष संयोग
यह 16 मई की अमावस्या और भी खास है क्योंकि अधिक मास 17 मई से शुरू होगा। यानी यह अमावस्या अधिक मास से ठीक पहले की है — और पंचांग के अनुसार इस समय किए गए शनि पूजन और पितृ तर्पण का फल कई गुना होता है।
Shani Amavasya Puja Vidhi – पूजा विधि
प्रातःकाल
- ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करें।
- शनि मंदिर जाएं या घर पर शनि यंत्र या शनि देव की तस्वीर के सामने दीप जलाएं।
- काला तिल, सरसों का तेल, काली उड़द दाल, और लोहे का दान करें।
- ‘ॐ शं शनैश्चराय नमः’ या ‘ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः’ मंत्र का 108 बार जाप करें।
कुतुप मुहूर्त में पितृ तर्पण
- दोपहर 11:36 – 12:24 बजे के बीच — दक्षिण दिशा में मुख करके।
- काले तिल, कुश घास और जल से पितरों को तर्पण दें।
- पितरों का नाम लेकर जल अर्पित करें।
- ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन कराएं।
पीपल पूजन
- पीपल के पेड़ में सरसों का तेल और जल चढ़ाएं।
- 107 बार पीपल की परिक्रमा करें (शनि अमावस्या पर यह संख्या शुभ)।
- पीपल की जड़ में दीपक जलाएं।
शनि दोष निवारण के उपाय – Shani Amavasya पर
- शनि मंदिर में सरसों का तेल शनि देव को अर्पित करें।
- काले तिल, काली उड़द दाल और काले कपड़े का दान करें।
- किसी विकलांग, वृद्ध या जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता करें — शनि देव इससे प्रसन्न होते हैं।
- हनुमान जी की पूजा करें — हनुमान जी शनि के प्रकोप से बचाते हैं।
- ‘शनि चालीसा’ का पाठ करें।
- दोपहर में काले कुत्ते को रोटी खिलाएं।
- नीलम या नीली रंग की चीजें दान करें।
हनुमान जी की आरती: हनुमान आरती हिंदी में
क्या खाएं / क्या न खाएं – Amavasya Vrat
| क्या करें | क्या न करें |
| फल — केला, सेब, अंगूर | माँस, मछली, अंडा |
| दूध, दही, मखाना | प्याज, लहसुन |
| कुट्टू या साबूदाना (व्रत में) | चावल, गेहूं (सख्त व्रत में) |
| तिल के लड्डू, गुड़ | तामसिक भोजन, नशा |
| काले तिल का दान और सेवन | नकारात्मक विचार |
Amavasya May 2026 – FAQs
मई 2026 में अमावस्या कब है?
मई 2026 में अमावस्या 16 मई, शनिवार को है। यह ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या है जो शनिवार को पड़ने के कारण ‘शनि अमावस्या’ बन जाती है।
शनि अमावस्या 2026 क्यों खास है?
2026 की शनि अमावस्या (16 मई) इसलिए खास है क्योंकि यह अधिक मास शुरू होने से ठीक एक दिन पहले है। इस अवसर पर शनि दोष निवारण, पितृ तर्पण और विष्णु पूजा का फल कई गुना होता है।
शनि अमावस्या पर क्या दान करें?
शनि अमावस्या पर काले तिल, सरसों का तेल, काली उड़द दाल, लोहे का सामान, काले कपड़े और अन्न का दान करना शुभ है। किसी विकलांग या वृद्ध की सेवा करना भी शनि देव को प्रिय है।
पितृ तर्पण के लिए सबसे अच्छा समय क्या है?
16 मई को कुतुप मुहूर्त — दोपहर 11:36 बजे से 12:24 बजे तक — पितृ तर्पण के लिए सर्वोत्तम समय है। इस दौरान दक्षिण दिशा में मुख करके काले तिल और कुश से तर्पण करें।
क्या अधिक मास में अमावस्या अलग होती है?
हाँ। अधिक मास (17 मई से 15 जून 2026) की अमावस्या 14 जून को होगी — इसे ‘अधिक ज्येष्ठ अमावस्या’ कहते हैं और यह भगवान विष्णु की विशेष पूजा के लिए सर्वोत्तम है।
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एकादशी: Ekadashi 2026 List
त्योहार: Hindu Festival Calendar 2026
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निष्कर्ष
शनि अमावस्या वह पावन दिन है जब श्रद्धा और कर्म — दोनों का संगम होता है। शनि देव न्यायकारी हैं — वे उन्हें दंड नहीं देते जो सच्चे मन से उनकी भक्ति करते हैं। इस दिन की पूजा, दान और पितृ तर्पण से जीवन में शांति, सुरक्षा और समृद्धि आती है।
ॐ शं शनैश्चराय नमः — शनि अमावस्या पर शनि देव की आराधना करें, उनकी कृपा पाएं।
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