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Bhairav Baba Ki Aarti in Hindi – जय भैरव देवा: सम्पूर्ण पाठ, अर्थ और महत्व

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Bhairav Baba Ki Aarti

काल भैरव – भगवान शिव का रौद्र और सर्वशक्तिमान स्वरूप। काशी (वाराणसी) के कोतवाल कहे जाने वाले भैरव बाबा भय, काल और नकारात्मक शक्तियों के नाशक हैं।

Bhairav Baba Ki Aarti गाने से भूत-प्रेत बाधा, शत्रु कष्ट और जीवन में आने वाले भय दूर होते हैं। रविवार और भैरव अष्टमी पर यह आरती विशेष रूप से फलदायी है।

Bhairav Baba Ki Aarti – एक नज़र में

देवताकाल भैरव / भैरव बाबा (शिव का रौद्र स्वरूप, काशी के कोतवाल)
आरती का नामजय भैरव देवा
गाने का समयरविवार – प्रातःकाल या सायंकाल
विशेष अवसरभैरव अष्टमी, रात्रि पूजा, काशी दर्शन
आरती अवधिलगभग 5 मिनट
आरती सामग्रीसरसों का तेल का दीप, काले तिल, उड़द दाल, सरसों, नारियल

Bhairav Baba Ki Aarti – सम्पूर्ण आरती पाठ

नीचे दी गई आरती श्रद्धापूर्वक गाएं – पूजा के अंत में दीप थाली घुमाते हुए।

जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा।

काल-त्रास-हरण तुम, दो मंगल-सेवा॥ जय भैरव देवा॥

श्यामवर्ण काया, भीषण रूप धारी।

त्रिशूल-डमरू लेकर, करो कल्याणकारी॥ जय भैरव देवा॥

काशी के कोतवाल, विश्वनाथ के द्वारी।

भूत-प्रेत को भगाओ, भक्तों के रखवारी॥ जय भैरव देवा॥

श्वान वाहन पर राजत, शराब प्रिय लागे।

भक्त जो तुम्हें पूजे, दुश्मन सब भागे॥ जय भैरव देवा॥

भैरव अष्टमी पर, व्रत जो करे।

सारे संकट उसके, हे भैरव हरे॥ जय भैरव देवा॥

जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा।

काल-त्रास-हरण तुम, दो मंगल-सेवा॥

Bhairav Baba Ki Aarti का अर्थ – भावार्थ

‘जय भैरव देवा’ – हे भैरव देव, तुम्हारी जय हो। ‘काल-त्रास-हरण’ – काल और भय को हरने वाले। ‘श्यामवर्ण काया’ – काले रंग का शरीर। ‘त्रिशूल-डमरू’ – शिव के आयुधों से युक्त। ‘काशी के कोतवाल’ – वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर के द्वारपाल – भैरव बाबा काशी की रक्षा करते हैं। ‘भूत-प्रेत को भगाओ’ – नकारात्मक शक्तियों के नाशक। ‘श्वान वाहन’ – कुत्ता भैरव जी का वाहन है। ‘भैरव अष्टमी’ – मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी पर भैरव जयंती मनाई जाती है।

Bhairav Baba Ki Aarti का महत्व

Bhairav Baba Ki Aarti विशेष रूप से उन लोगों के लिए है जो भय, शत्रु या नकारात्मक शक्तियों से परेशान हों। काशी में भैरव बाबा के बिना कोई यात्रा पूरी नहीं होती। रात्रि पूजा में भैरव बाबा की आरती विशेष शक्तिशाली होती है।

काल भैरव – पौराणिक कथा

एक बार ब्रह्मा जी को पाँच मुख होने का अभिमान हो गया। वे शिव जी से भी अपने को बड़ा बताने लगे। तब शिव जी ने क्रोध में काल भैरव को प्रकट किया। भैरव ने अपने नाखून से ब्रह्मा का पाँचवाँ मुख काट दिया – इसीलिए भैरव ‘कपाली’ भी कहलाए। यह पाप लगने पर भैरव ने काशी में प्रायश्चित किया। शिव जी ने उन्हें काशी का कोतवाल नियुक्त किया – तभी से काशी में भैरव बाबा की विशेष पूजा होती है।

Bhairav Baba Ki Aarti – आरती विधि

  1. रविवार को या भैरव अष्टमी पर भैरव मंदिर जाएं।
  2. सरसों के तेल का दीप जलाएं।
  3. उड़द दाल, काले तिल और नारियल का भोग लगाएं।
  4. ‘ॐ भैरवाय नमः’ का 108 बार जाप करें।
  5. ‘जय भैरव देवा’ आरती गाएं।
  6. काले कुत्ते को रोटी खिलाएं – यह भैरव जी का वाहन है।

Bhairav Baba Ki Aarti – कब गाएं?

  • रविवार – भैरव बाबा का विशेष दिन
  • भैरव अष्टमी (मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी)
  • रात्रि पूजा में – भैरव बाबा रात्रि के देवता हैं
  • काशी यात्रा के दौरान – बाबा विश्वनाथ के बाद भैरव दर्शन
  • जब जीवन में अत्यधिक भय या शत्रु कष्ट हो

Bhairav Baba Ki Aarti गाने के लाभ

  • भय और आतंक से पूर्ण मुक्ति
  • भूत-प्रेत और नकारात्मक शक्तियों का नाश
  • शत्रुओं पर विजय
  • रात्रि में सुरक्षा और निर्भय नींद
  • काशी यात्रा का सम्पूर्ण फल
  • तांत्रिक बाधाओं से रक्षा

Bhairav Baba Ki Aarti – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Bhairav Baba Ki Aarti कब गाएं?

रविवार को। भैरव अष्टमी पर। रात्रि पूजा में। काशी यात्रा में भैरव मंदिर जाने पर।

काल भैरव और बटुक भैरव में क्या अंतर है?

काल भैरव उग्र रूप हैं – काले वर्ण के। बटुक भैरव सौम्य बालक रूप हैं – गोरे वर्ण के। दोनों भैरव के अलग-अलग स्वरूप हैं।

भैरव बाबा को क्या भोग चढ़ाएं?

उड़द दाल, काले तिल, नारियल, और सरसों के तेल का दीप। कुछ परंपराओं में मदिरा भी चढ़ाई जाती है – परंतु यह स्थान विशेष की परंपरा है।

काशी में भैरव बाबा के दर्शन क्यों जरूरी?

काशी विश्वनाथ के बाद भैरव बाबा के दर्शन बिना काशी यात्रा अधूरी मानी जाती है – वे काशी के कोतवाल हैं।

भैरव अष्टमी कब है?

भैरव अष्टमी मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है – इसे काल भैरव जयंती भी कहते हैं।

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निष्कर्ष

Bhairav Baba Ki Aarti – यह केवल एक गीत नहीं है। जब भक्त श्रद्धाभाव से दीप थाली घुमाते हैं और काल भैरव की स्तुति गाते हैं, तो एक अलौकिक संबंध जुड़ता है। आज से प्रतिदिन इस आरती को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं।

ॐ भैरवाय नमः! – Bhairav Baba Ki Aarti गाएं, काल भैरव की सुरक्षा से जीवन के हर भय और संकट दूर हों।
Sharandham पर देखें: सम्पूर्ण व्रत कथा संग्रह | आरती संग्रह | चालीसा संग्रह

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Baglamukhi Chalisa in Hindi – सम्पूर्ण पाठ, अर्थ और महत्व

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Baglamukhi Chalisa in hindi

माँ बगलामुखी – दस महाविद्याओं में से एक, शत्रु-स्तंभन और वाक्-सिद्धि की देवी। पीत (पीले) रंग से इनकी पूजा होती है। Baglamukhi Chalisa उन लोगों के लिए विशेष है जो शत्रुओं से परेशान हों, कोर्ट-केस में फँसे हों, या किसी की बुरी शक्ति से पीड़ित हों।

Baglamukhi Chalisa in Hindi – एक नज़र में

देवतामाँ बगलामुखी
पाठ का दिनमंगलवार, शुक्रवार, एकादशी
मुख्य लाभशत्रु स्तंभन – दुश्मनों की शक्ति रोकना, वाक्-सिद्धि – बोले हुए शब्द सच होते हैं
प्रमुख मंत्रॐ ह्रीं बगलामुख्यै नमः

Baglamukhi Chalisa in Hindi – सम्पूर्ण पाठ

दोहा (Doha)

जय माँ बगलामुखी भवानी। शत्रु-स्तम्भन की महारानी॥

पीत वस्त्रा, पीत आसन सोहे। भक्तों के मन को मोहे॥

चौपाई (Chaupai) – 40 पद

॥ श्री बगलामुखी चालीसा ॥

जय जय माँ बगलामुखी महाराज,
करो भक्तों का सदा काज॥

दिव्य स्वरूप, अतुल महिमा,
भक्तों को दो सुख की सीमा॥

पीताम्बरा, शुभ्र स्वरूपा,
दुष्टनाशिनी, महा अनूपा॥

शत्रु-वाणी स्तंभित कर देती,
भक्तों की रक्षा तुम करती॥

दशमहाविद्या में तुम न्यारी,
करती संकट हरण भारी॥

पीत वस्त्र, कमल आसन धारी,
भक्तों की तुम हो रखवाली॥

जो कोई तुमको ध्याता है,
मनवांछित फल पाता है॥

संकट में जो तुम्हें पुकारे,
तुम दौड़ी आती तत्काले॥

दीन-दुखियों की तुम सहारा,
करती सबका उद्धारा॥

रोग-शोक सब दूर भगाओ,
सुख-समृद्धि घर में लाओ॥

अज्ञान अंधेरा दूर करो,
ज्ञान का दीप भरपूर करो॥

भक्ति, शक्ति, बुद्धि प्रदानो,
जीवन पथ को सरल बनाओ॥

जो यह चालीसा पढ़े,
माँ कृपा से आगे बढ़े॥

सच्चे मन से जो कोई ध्यावे,
माँ उसकी लाज बचावे॥

अंत समय मोक्ष दिलाओ,
जीवन सफल सदा बनाओ॥

उत्तर-दोहा (Uttar Doha)

जो पढ़े Baglamukhi यह चालीसा, धर कर ध्यान।

नित नव मंगल घर बसे, मिले जगत सम्मान॥

Baglamukhi Chalisa in Hindi का अर्थ – भावार्थ

माँ बगलामुखी चालीसा में उनके दिव्य स्वरूप, उनकी शक्तियों और भक्तों पर उनकी कृपा का अनुपम वर्णन है। हर दोहे और चौपाई में उनके गुणों को काव्यात्मक भाषा में प्रस्तुत किया गया है।

Baglamukhi Chalisa in Hindi का महत्व – क्यों पढ़ें?

माँ बगलामुखी चालीसा का नियमित पाठ जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाता है। श्रद्धा और भक्तिभाव से किया गया पाठ ईश्वर की कृपा का द्वार खोलता है।

माँ बगलामुखी – पौराणिक कथा

एक बार ब्रह्मांड में भयंकर आंधी-तूफान आया जो सब कुछ नष्ट करने वाला था। देवताओं ने हरिद्रा सरोवर के तट पर माँ आदिशक्ति की आराधना की। माँ बगलामुखी प्रकट हुईं और अपने हाथ से उस तूफान को थाम लिया – यही उनकी ‘स्तंभन शक्ति’ है।

सम्पूर्ण आरती और पूजा सामग्री: Sharandham.com

Baglamukhi Chalisa in Hindi – पाठ विधि और सही समय

मंगलवार, शुक्रवार, एकादशी को स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। माँ बगलामुखी की प्रतिमा या चित्र के सामने दीप, फूल अर्पित करें। ‘ॐ ह्रीं बगलामुख्यै नमः’ का जाप करके चालीसा पढ़ें।

Baglamukhi Chalisa in Hindi पाठ के लाभ

  • शत्रु स्तंभन – दुश्मनों की शक्ति रोकना
  • वाक्-सिद्धि – बोले हुए शब्द सच होते हैं
  • कोर्ट-केस में विजय
  • तंत्र-बाधा से रक्षा
  • विरोधियों का दमन

Baglamukhi Chalisa in Hindi – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Baglamukhi Chalisa in Hindi कब पढ़ें?

मंगलवार, शुक्रवार, एकादशी को विशेष फल मिलता है। नियमित पाठ भी किया जा सकता है।

माँ बगलामुखी चालीसा का क्या लाभ है?

शत्रु स्तंभन – दुश्मनों की शक्ति रोकना, वाक्-सिद्धि – बोले हुए शब्द सच होते हैं – ये प्रमुख लाभ हैं।

माँ बगलामुखी का मंत्र क्या है?

‘ॐ ह्रीं बगलामुख्यै नमः’ – यह माँ बगलामुखी का मुख्य मंत्र है। 108 बार जाप करें।

क्या Baglamukhi Chalisa in Hindi PDF मिल सकती है?

हाँ, Sharandham.com पर पूर्ण पाठ उपलब्ध है।

कितने दिन पाठ करें?

21 दिन, 40 दिन या नियमित पाठ – जितना संभव हो। श्रद्धा सबसे जरूरी है।

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निष्कर्ष

Baglamukhi Chalisa in Hindi केवल कुछ शब्दों की रचना नहीं है – यह एक भक्त का अपने आराध्य से संवाद है। जब कोई श्रद्धाभाव से इन 40 पदों को पढ़ता है, तो वह माँ बगलामुखी के साथ एक अदृश्य धागे से जुड़ जाता है। आज से ही नियमित पाठ शुरू करें।

ॐ ह्रीं बगलामुख्यै नमः – Baglamukhi Chalisa का पाठ करें, माँ की शक्ति से शत्रु पर विजय पाएं।
Sharandham पर देखें: सम्पूर्ण व्रत कथा संग्रह | आरती संग्रह | चालीसा संग्रह

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Somvar Vrat Aarti in Hindi – सोमवार व्रत शिव आरती: सम्पूर्ण पाठ, अर्थ और महत्व

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Somvar Vrat Aarti

सोमवार – भगवान शिव का सबसे प्रिय दिन। ‘सोम’ माने चंद्रमा – और शिव जी के मस्तक पर चंद्रमा विराजमान है इसीलिए सोमवार उनका दिन है। हर सोमवार उपवास रखना और शिव जी की आरती गाना – यह करोड़ों शिवभक्तों की दिनचर्या है।

Somvar Vrat Aarti – ‘जय शिव ओंकारा’ – सोमवार व्रत की आत्मा है। श्रावण मास के सोमवार और 16 सोमवार व्रत में यह आरती विशेष रूप से फलदायी है।

Somvar Vrat Aarti – एक नज़र में

देवताभगवान शिव (महादेव, भोलेनाथ, शंकर, सोमनाथ)
आरती का नामजय शिव ओंकारा – सोमवार व्रत आरती
गाने का समयसोमवार – प्रातःकाल शिव अभिषेक के बाद
विशेष अवसरश्रावण सोमवार, 16 सोमवार व्रत, प्रदोष
आरती अवधिलगभग 7–8 मिनट
आरती सामग्रीबेलपत्र, गंगाजल, दूध, धतूरा, भाँग, घी का दीप

Somvar Vrat Aarti – सम्पूर्ण आरती पाठ

नीचे दी गई आरती श्रद्धापूर्वक गाएं – पूजा के अंत में दीप थाली घुमाते हुए।

जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्धांगी धारा॥ जय शिव ओंकारा॥

एकानन चतुरानन, पंचानन राजे।

हंसासन गरुड़ासन, वृषवाहन साजे॥ जय शिव ओंकारा॥

दो भुज चार चतुर्भुज, दस भुज अति सोहे।

तीनों रूप निरखते, त्रिभुवन जन मोहे॥ जय शिव ओंकारा॥

अक्षमाला वनमाला, मुण्डमाला धारी।

त्रिपुरारी कंसारी, करत नित नारी॥ जय शिव ओंकारा॥

श्रावण सोमवार को, भक्त व्रत रखते।

बेलपत्र जलाभिषेक, शिव-कृपा पाते॥ जय शिव ओंकारा॥

सोलह सोमवार को, पूजा करें जो।

मनवांछित पति-वर पाएं, सुख से रहें तो॥ जय शिव ओंकारा॥

जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्धांगी धारा॥

Somvar Vrat Aarti का अर्थ – भावार्थ

‘जय शिव ओंकारा’ – ओंकार (ॐ) स्वरूप शिव की जय। ‘ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्धांगी धारा’ – शिव त्रिदेवों के मूल हैं और माँ पार्वती (अर्धांगी) उनके साथ। ‘एकानन’ – एक मुख (शिव का साधारण रूप), ‘चतुरानन’ – चार मुख (ब्रह्मा), ‘पंचानन’ – पाँच मुख (शिव का पंचमुखी रूप)। ‘वृषवाहन’ – नंदी बैल पर सवार। ‘श्रावण सोमवार को, बेलपत्र जलाभिषेक’ – श्रावण में जल और बेलपत्र से शिव अभिषेक अत्यंत प्रिय है। ‘सोलह सोमवार’ – 16 सोमवार व्रत से मनचाहा वर या सुख मिलता है।

Somvar Vrat Aarti का महत्व

Somvar Vrat Aarti सोमवार व्रत का अनिवार्य अंग है। भगवान शिव ‘भोले’ हैं – वे जल्दी प्रसन्न होते हैं और जल्दी वर देते हैं। सोमवार को शिवलिंग का अभिषेक और ‘जय शिव ओंकारा’ आरती गाने से मनोकामनाएं शीघ्र पूरी होती हैं। कुँवारी कन्याएं 16 सोमवार व्रत रखती हैं – इससे मनचाहा वर मिलता है।

भगवान शिव – पौराणिक कथा

16 सोमवार व्रत की कथा – एक राजा-रानी अमरावती नगरी में रहते थे। एक बार शिव-पार्वती उनके बगीचे में विराजे। माँ पार्वती ने शिव जी के साथ चौपड़ खेला और राजा से पूछा – ‘बताओ, कौन जीतेगा?’ राजा ने झूठ बोलकर माँ पार्वती को विजेता बता दिया। पार्वती जी ने खुश होकर राजा को 16 सोमवार व्रत का विधान बताया। राजा ने व्रत किया और उसके जीवन में सब मनोकामनाएं पूरी हुईं। तभी से 16 सोमवार व्रत की परंपरा चली।

Somvar Vrat Aarti – आरती विधि

  1. सोमवार को प्रातःकाल स्नान करके व्रत का संकल्प लें।
  2. शिव मंदिर जाएं – या घर पर शिवलिंग स्थापित करें।
  3. गंगाजल, दूध, दही, शहद और गुलाबजल से शिव अभिषेक करें।
  4. बेलपत्र, धतूरा, भाँग और सफेद फूल अर्पित करें।
  5. ‘ओम नमः शिवाय’ का 108 बार जाप करें।
  6. घी का दीप जलाकर ‘जय शिव ओंकारा’ आरती गाएं।
  7. दिन में एकल भोजन या फलाहार – शाम को व्रत खोलें।

Somvar Vrat Aarti – कब गाएं?

  • हर सोमवार – नियमित व्रत
  • श्रावण मास के सोमवार – विशेष महत्व (जुलाई-अगस्त)
  • 16 सोमवार व्रत – लगातार 16 सोमवार
  • महाशिवरात्रि (15 फरवरी 2026) – सबसे बड़ा शिव पर्व
  • प्रदोष व्रत – हर महीने त्रयोदशी को

Somvar Vrat Aarti गाने के लाभ

  • मनचाहे वर या वधु की प्राप्ति – 16 सोमवार व्रत से
  • वैवाहिक जीवन में सुख और प्रेम
  • संतान सुख और परिवार में खुशहाली
  • रोग और कष्टों से मुक्ति
  • शिव-पार्वती का विशेष आशीर्वाद
  • मन में शांति और जीवन में सौभाग्य
  • श्रावण सोमवार व्रत से पुण्य का विशेष लाभ

Somvar Vrat Aarti – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Somvar Vrat Aarti कब गाएं?

हर सोमवार – शिव अभिषेक के बाद। श्रावण मास के सोमवार पर विशेष।

16 सोमवार व्रत कैसे करें?

16 लगातार सोमवार शिव जी का व्रत, पूजा, कथा-श्रवण और आरती। अंत में उद्यापन पूजा।

सोमवार व्रत में क्या खाएं?

दिन में एक बार – सात्त्विक भोजन। फलाहार भी कर सकते हैं। नमक का उपयोग परंपरा के अनुसार।

शिव जी को बेलपत्र क्यों चढ़ाएं?

बेलपत्र (बिल्वपत्र) शिव जी को सबसे प्रिय है। शास्त्रों में कहा – एक बेलपत्र चढ़ाने से 1000 कमल चढ़ाने का फल मिलता है।

श्रावण सोमवार 2026 कब हैं?

2026 में श्रावण मास जुलाई-अगस्त में है। श्रावण के प्रत्येक सोमवार शिव पूजा का विशेष महत्व है।

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शिव चालीसा: शिव चालीसा

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अमावस्या 2026: Amavasya 2026 Dates

गंगा माता की आरती: गंगा माता की आरती

निष्कर्ष

Somvar Vrat Aarti – यह केवल शब्द नहीं, यह भक्त का अपने आराध्य से संवाद है। जब दीप की लौ के सामने यह आरती गाई जाती है, तो पूजा घर का कण-कण पवित्र हो जाता है। आज से इसे अपनी नित्य दिनचर्या का हिस्सा बनाएं।

ओम नमः शिवाय! – Somvar Vrat Aarti हर सोमवार गाएं, भोलेनाथ की कृपा से जीवन में शांति और मनोकामना पूरी हो।
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Ekadashi Aarti in Hindi – एकादशी पूजन आरती: सम्पूर्ण पाठ, अर्थ और महत्व

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Ekadashi Aarti in Hindi

एकादशी – भगवान विष्णु की सबसे प्रिय तिथि। हर माह दो बार आने वाली यह तिथि भक्ति और व्रत का अनुपम अवसर है। एकादशी पर सारी रात जागरण करके ‘ओम जय जगदीश हरे’ गाना – यही विष्णु भक्तों की सबसे बड़ी साधना है।

Ekadashi Aarti – एकादशी व्रत का अनिवार्य और सबसे पवित्र अंग है। व्रत के दिन रात्रि में और पारण से ठीक पहले यह आरती गाने से पूर्ण फल मिलता है।

Ekadashi Aarti – एक नज़र में

देवताभगवान विष्णु (श्री हरि, नारायण, जगदीश)
आरतीओम जय जगदीश हरे – एकादशी विशेष
व्रतहर माह दो एकादशी – साल 2026 में 26 एकादशी
गाने का समयएकादशी व्रत के दिन – रात्रि जागरण में और पारण से पहले
पारणअगले दिन द्वादशी तिथि में – सूर्योदय के बाद
विशेषदेवशयनी (25 जुलाई), निर्जला (25 जून), मोक्षदा (20 दिसंबर) एकादशी

Ekadashi Aarti – सम्पूर्ण आरती पाठ

नीचे दी गई आरती श्रद्धापूर्वक गाएं – पूजा के अंत में दीप थाली घुमाते हुए।

ओम जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।

भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ओम जय जगदीश हरे॥

एकादशी के दिन प्रभु, व्रत करें भक्त।

रात जागरण करते हैं, भजन करते अनुरक्त॥ ओम जय जगदीश हरे॥

तुलसी दल प्रिय तुम्हें, पंचामृत चढ़ाएं।

चावल त्याग करके हम, पारण सुखी पाएं॥ ओम जय जगदीश हरे॥

देवशयनी से देव उठनी, चातुर्मास काल।

निर्जला एकादशी में, मिले सारा फल॥ ओम जय जगदीश हरे॥

मोक्षदा एकादशी पर, गीता जयंती मनाएं।

वैकुंठ द्वार खुलता है, हरि-भक्ति दिखाएं॥ ओम जय जगदीश हरे॥

ओम जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।

भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥

Ekadashi Aarti का अर्थ – भावार्थ

‘ओम जय जगदीश हरे’ – जगत के ईश, श्री हरि की जय। ‘एकादशी के दिन प्रभु, व्रत करें भक्त’ – एकादशी व्रत विष्णु जी को समर्पित। ‘तुलसी दल प्रिय’ – बिना तुलसी के विष्णु पूजा अधूरी। ‘चावल त्याग करके’ – एकादशी पर चावल वर्जित है। ‘देवशयनी से देव उठनी, चातुर्मास’ – इन चार महीनों में विष्णु जी योगनिद्रा में जाते हैं। ‘निर्जला एकादशी में मिले सारा फल’ – यह सर्वश्रेष्ठ एकादशी है। ‘मोक्षदा एकादशी पर गीता जयंती’ – इसी दिन भगवान कृष्ण ने गीता का उपदेश दिया।

Ekadashi Aarti का महत्व

Ekadashi Aarti एकादशी व्रत का समापन है। रात्रि जागरण में इस आरती को गाने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा मिलती है। 2026 में 26 एकादशियाँ हैं – इनमें से निर्जला (25 जून), देवशयनी (25 जुलाई) और मोक्षदा (20 दिसंबर) सबसे महत्वपूर्ण हैं।

भगवान विष्णु – पौराणिक कथा

एकादशी व्रत की उत्पत्ति की कथा पद्म पुराण में है। एक बार मुर नामक दानव ने देवलोक पर कब्जा किया। भगवान विष्णु उससे युद्ध करते-करते एक गुफा में सो गए। उनकी शरीर से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई जिसने मुर का वध किया। यह शक्ति एकादशी तिथि को प्रकट हुई थी – इसीलिए इस तिथि का नाम ‘एकादशी’ और यह भगवान विष्णु की सबसे प्रिय तिथि बनी।

Ekadashi Aarti – आरती विधि

  1. एकादशी के दिन सूर्योदय से व्रत शुरू करें।
  2. भगवान विष्णु की पूजा – तुलसी, पंचामृत, पीले फूल अर्पित करें।
  3. दिन में ‘ओम नमो भगवते वासुदेवाय’ का जाप करें।
  4. रात्रि जागरण – भजन, कीर्तन और एकादशी कथा का श्रवण।
  5. ‘ओम जय जगदीश हरे’ और ‘एकादशी आरती’ गाएं।
  6. अगले दिन द्वादशी में – पारण से पहले आरती करें।
  7. ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन कराकर पारण करें।

Ekadashi Aarti – कब गाएं?

  • हर एकादशी – महीने में दो बार (साल में 26 बार – 2026 में)
  • निर्जला एकादशी (25 जून 2026) – सर्वश्रेष्ठ
  • देवशयनी एकादशी (25 जुलाई 2026) – चातुर्मास शुरू
  • देवउठनी एकादशी (20 नवंबर 2026) – चातुर्मास समाप्त
  • मोक्षदा एकादशी (20 दिसंबर 2026) – गीता जयंती

Ekadashi Aarti गाने के लाभ

  • सभी एकादशियों का सम्पूर्ण फल
  • मोक्ष का मार्ग – एकादशी व्रत से वैकुंठ प्राप्ति
  • पापों का नाश और आत्मशुद्धि
  • परिवार में सुख और विष्णु जी की कृपा
  • रात्रि जागरण से विशेष पुण्य-प्राप्ति
  • 26 एकादशियाँ – 26 गुना पुण्य (2026 में)

Ekadashi Aarti – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Ekadashi Aarti कब गाएं?

एकादशी के दिन – विशेषतः रात्रि जागरण में। पारण से पहले भी आरती करें।

एकादशी में चावल क्यों नहीं खाते?

शास्त्रों के अनुसार एकादशी के दिन चावल में ब्राह्मण-तत्व का वास होता है – इसे खाने से पाप लगता है और व्रत का फल नष्ट होता है।

2026 में सबसे महत्वपूर्ण एकादशी कौन सी है?

निर्जला एकादशी (25 जून) – जो सभी एकादशियों का फल देती है। मोक्षदा एकादशी (20 दिसंबर) – गीता जयंती – भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

एकादशी पर रात्रि जागरण क्यों?

रात जागकर भजन-कीर्तन और आरती करने से विष्णु जी प्रसन्न होते हैं और व्रत का कई गुना फल मिलता है।

पारण का सही समय क्या है?

अगले दिन द्वादशी तिथि में – सूर्योदय के बाद हरि वासर समाप्ति के पश्चात। पारण का समय पंचांग में देखें।

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निष्कर्ष

Ekadashi Aarti – यह केवल शब्द नहीं, यह भक्त का अपने आराध्य से संवाद है। जब दीप की लौ के सामने यह आरती गाई जाती है, तो पूजा घर का कण-कण पवित्र हो जाता है। आज से इसे अपनी नित्य दिनचर्या का हिस्सा बनाएं।

ओम जय जगदीश हरे! – Ekadashi Aarti हर एकादशी पर गाएं, भगवान विष्णु की कृपा से मोक्ष का मार्ग मिले।
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